नमक

जिन्हें महज़ रास्ते
समझते थे
वो लम्हों के
कतरों से भरे
वक़्त के दरिया थे

उनकी
पिघली हुई
ग्लेशियर रूहों में
लौटना
मुमकिन नहीं था

समंदर होना था
खारा मुक़द्दर उनका
उम्र की धूप में
इश्क़ था
बचा हुआ
ज़रा सा नमक

 

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