ताउम्र सफ़र

ताउम्र सफ़र

सब सफ़र ही है, पड़ाव हैं , रास्ते हैं , आने की ख़ुशी है और जाने के ग़म हैं। मंज़िलें जो अचानक मिलीं , खुशियां जो अनचाहे भी रूह भर गयी , दुःख जिनसे दामन बचाते रहे पर फिर भी जिनकी आंच छू ही गयी। रूह बहती रही , हंसती – रोती रही, पाती -खोती रही , नए लफ्ज़ तराशे , नए अक्स आज़माये , अजनबी मिले जो हमसफ़र हुए, हमसफ़र जो खो गए , दोस्त , हमदम , बेरहम सब सफर ही तो हैं – मेरा मुझ तक , मेरी क़ैद भी मैं और रिहाई भी , इन दोनों के बीच का उलझ धागा भी मैं।

मैं हूँ एक ताउम्र सफ़र