एहसां

इतने लम्बे गिले ,इतनी कम ज़िन्दगी ,और फिर हरेक के दिल में मेरे लिए शिकायतों के सैंकड़ों कंकड़। उफ़ ये बोझ , ये उलझनें , काश लफ़्ज़ों के दरिया में डुबोये जा सकती तन्हाई……..

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई , जैसे एहसां उतारता है कोई

भुला सका न ये सिलसिला जो था ही नहीं

दर्द के नाम एक और नगमा

ख़ुशी कभी इतने पीछे छूट जाती है , कि झूठ लगने लगती है। जो तूफ़ान में हाथ नहीं थामते उनके सब दिलासे मज़ाक लगते हैं। ग़म एक पारखी है , दर्द की बर्दाश्त भी परखता है और अपनों का साथ भी।
बहुत अर्से बाद सोनू निगम की आवाज़ ,और दर्द के नाम एक और नगमा

पिंजरा,पंछी,हवा

दाग अच्छे हैं , चोट ,ठोकर जितना सिखा देती है उतना ख़ुशी का हौसला कहाँ। मैं हमेशा कहती हूँ हमेशा कुछ नहीं रहता , इसलिए तेज़ बुखार से पैदा हुए भ्रम भी भूलना नहीं चाहती। धोखे भी अच्छे हैं , तस्वीरें और लफ्ज़ जैसे चाहे इस्तेमाल किये जा सकते है मगर रूह की आवाज़ को मॉर्फ़ करना या आँखों के झूठ को फोटोशॉप करना  मुमकिन नहीं।

बना रहे दुनिया का भरम कि जो अच्छे है वो अच्छे ही हैं, किसी को तो बुरा साबित होना ही होगा अच्छों की अच्छाई बचाने के लिए। रंजिश कैसी और ग़म क्यों ? मैंने कहा था न , न पिंजरा बनना , न पंछी , हवा हो हवा ही रहना , जीने के लिए ज़रूरी और इनविज़िबल !

निर्वासित

पिछले दिनों टीवी पर दो फिल्में बार-बार देखी – Lisa Genova की मश्हूर नावेल Still Alice पर आधारित इसी नाम की फिल्म और कई सालों से मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक Castaway.

दोनों बिलकुल अलग कहानियां हैं , पहली में जूलियन मूर एक Alzihmer रोगी की जद्दोजेहद दिखाती हैँ और दूसरी में टॉम हैंक्स एक हवाई जहाज़ हादसे के बाद एक वीरान टापू पर चार साल अकेले बचने वाले सर्वाइवर की कहानी दिखाते हैं।

एक में दिमाग होश की लकीरों को फांदता चला जाता है और शख्स दिन पर दिन अपने वजूद में क़ैद , और दूसरी में भी जहाँ ज़िन्दगी की लड़ाई शरीर से लड़ी तो जा रही है पर है तो माइंड गेम ही

हम सबने जूलियन जैसे एक सुसाइड इंस्ट्रक्शन वीडियो दिमाग में बना रखा है पर कभी उस पर अमल की हिम्मत नहीं जुटाते , मरने का ख्याल कमज़ोरी नहीं होता बेबसी होता  है

सर्वाइवल की कहानियाँ सबको नसीब नहीं , सब निर्वासित हैं अपने -अपने वीरान टापू पर।

त्रासदी

बचपन में बड़े हो जाना
इश्क़ की उम्र में
मौत की तमन्ना करना
अच्छी यादें धुंधली पड़ जाना
वक़्त का हिसाब
भूलते जाना
सब त्रासदी हैं

साल दर साल
कैलेंडरों पर लाल पेन से
तारीखें काटना
ज़िन्दगी का काउंटडाउन
सांसों से करते जाना
त्रासदी है

दिल एक उम्मीद का क़तरा है

एक पसंदीदा चश्मा जब से टूटा है , कुछ चेहरे और साफ दिखने लगे हैं।  हर रिश्ता एक नरम ऊन के स्वेटर जैसा , एक भी धागा खिंचा तो सारे धागे उधड़ने लगते है।  ज़िन्दगी का हर चिथड़ा कभी एक नया स्वेटर था। अपनी तकलीफ का जवाब दूसरे को तकलीफ देकर हासिल हो ये नामुमकिन है।

जिनके हाथ छोड़ कर नए हाथ थामे हैं , कभी सोचा उनकी यादों का क्या हुआ , साल सिर्फ उम्र नहीं होते ,साल यादों के ताने बाने होते हैं। जिनके साथ हमने अपनी ज़िन्दगी के साल बाँटे , यादें बनायीं  , क्या उनकी छाप मिटती है कभी रूह के खांचे से।

दिल एक उम्मीद का क़तरा है , रिश्तों की चिताओं से रौशनी तलाशता, उधड़े हुए सपनों के टुकड़े संजोता ….

सर्द मौसम नहीं रूह का आलम है

उदासियों का मौसम

ये शहर एक लम्बा उपन्यास है , इसके लाखों सब-प्लाट है , जो कब शुरू हुए ,कब खत्म कोई हिसाब नहीं। ये एक लड़ाई का मैदान है जिसने मरने वालों की गिनती छोड़ दी है। सर्दियाँ उदासियों का मौसम हैं , मेट्रो के पुलों के नीचे , फ्लाईओवरों की ओट में ही नहीं, पेन्टहोउसों और आलीशान अपार्टमेंट्स में भी छुपी हैं अवसाद से भरी अभाव की कहानियाँ।

रूहों की तन्हाइयां , दिलों की खलिश, ज़ेहन के अँधेरे बिजली की रोशनियों से ,बाजार की चीज़ों से भरे हैं कभी। दूरियां हमेशा नाप सके ऐसी इंसानों की औकात कहाँ , कुछ ज़िन्दगी से लम्बी ,वजूद से भारी