ज्वालामुखी

कभी कभी
अंदर का ज्वालामुखी
उबलने लगता है

यादों के
झुलसे हुए स्याह पत्थरों से
झड़ती है गर्म राख

आसान लफ्ज़ नहीं मिलते
आवाज़ खामोश लम्हों
के मलबे में दबी जाती है

और आँखों के किनारों से
फूटता है रूह का लावा

Didigeridoo

रेत और लहरों से
जाने कब का
रिश्ता है

मेरी रूह
किसी सुनसान
रेगिस्तान में
एक तन्हा
डिडिगरिडू

चाँद

perigee

इस चाँद के
हज़ार महबूब हैं
विलाप करते भेड़िये
तन्हा ज्वारभाटे
और टूटे दिलों का
मरहम खोजते
मायूस आशिक़

लेकिन चाँद
का मुक़द्दर है
दीवानों की तरह
मिट-मिट के जीना
जी-जी के मरना

मुकम्मल हो के भी
रहना अधूरा
और अधूरेपन में भी
मुक़म्मल रहना

सवाल

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My Late father , long before he was my father 

Image : Perosnal collection copyright

कैसा था वो सरहद पार का आपका बचपन
वो झेलम में तैरना , पहली बार सुनना रेडियो
देखना बिजलीवाले बल्बों का जादू
और फिर एक दिन बेघर होकर
लाशों से भरी रेल में
समझना रिफ्यूजी होने का मतलब

कैसा था वो नए देश में नयी आज़ादी का स्वाद
नया -नया लड़कपन ,पहली बड़ी साइकिल की चमक
पहला वोट,पहला प्यार ,पहली नौकरी
पहली सिगरेट ,पहली शायरी
ब्लैक एंड वाइट फिल्मों वाला दीवानापन

कैसा था आपका सफर -बेटे,भाई ,पति होने का
कैसे बदली थी आपकी मर्दानगी
जब मार्च की एक शाम
मेरे होने ने बनाया आपको मेरा पिता
कैसा था वो दूसरा जनम

क्या थी आपकी ज़ाती शिकस्तें
क्या था वो ग़म जो मुझसे भी नहीं कहा
क्या ताउम्र सताते रहे आपको ४७ के डर
क्या मुझपे गुमान करते हुए कभी
हुए थे आपकी आँखों के कोर नम

उस दिन शमशान में ,मैंने खुद जलाया था
वो जिस्म जिसकी ये कहानियां हैं
क्या देख पाए थे आप तब भी
मेरे कठोर बैरागी चेहरे के पीछे
पिघलता हुआ मेरा मन

जिस्म मरने पर भी
रिश्ते कब मरा करते हैं
जैसे उस दिन आपके साथ
थोड़ा मरी थी मैं
वैसे ही मुझमें
अब भी ज़िंदा है आप हरदम

खून #PeriodPride

periodpride-blogathon-2

माँ और मातृत्व तो पूजनीय है
पर गर्भाशय मेरा अपवित्र
जिस खून में जीवन पलता है
वो खून कैसे प्रदूषित

इससे बढ़कर अपमान है क्या
की मेरे शरीर को अशुद्ध मानो
और मुझको तुम मजबूर करो
कि खुद को मानूँ मैं शापित

क्या तुम होते ,क्या जीवन होता
यदि होता न ये ऋतुस्राव
फिर कैसे जीवन का पहला पोषण
ये खून मेरा दूषित ?

“This blogathon is supported by the Maya App, used by 6.5 million women worldwide to take charge of their periods and health.”

दोबारा पूछो

 

 

डिप्रेशन /अवसाद किसी को भी घेर सकता है , जो तन्हा हैं , किसी तक़लीफ़ में हैं उन्हें तो अक्सर घेरता ही है लेकिन कभी -कभी सब कुछ अच्छा होते हुए भी  ये एक न दिखने वाले प्रेत जैसे मन में घर कर जाता है।

अवसाद छुपाना भी आम है क्योंकि हमारा समाज मानसिक तकलीफों के लिए एक सामूहिक शब्द इस्तेमाल करता है – पागल, जो अक्सर गाली या तिरस्कार जैसे बोला जाता है , जैसे मानसिक बीमारी कोई जान बूझ कर की हुई गलती हो , या कोई पाप। इसलिए लोग सालों साल मर- मर कर जीते हैं , और बोलते रहते हैं ‘मैं ठीक हूँ “.

फिर किसी दिन जब कोई आत्महत्या होती है या कोई अवसादग्रसित कोई अपराध करता है , कूदते है डिबेट में , ये करना चाहिए था….. ऐसा नहीं हुआ, वैसा होता तो। …..

किसी हादसे का इंतज़ार मत करो
किसीके टुकड़े टुकड़े बिखरने तक
चुपचाप तमाशा मत देखो

पूछो, सुनो ,महसूस करो
हाथ बढाओ ,
दोबारा पूछो

रावण और हीथक्लीफ़

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“Until the lions have their own historians, the history of the hunt will always glorify the hunter.”― Chinua Achebe

बचपन की एक याद
हर साल दशहरे पर
दोस्तों के साथ रावण बनाना
ऐसा कोई लंका के राजा
जैसा भव्य या विशाल नहीं
या बड़ी बड़ी रामलीलाओं
जैसा अहंकार का परिचायक नहीं
पुराने कपड़ों, अख़बारों
गत्ते ,भूसे से भरा
हमीं जैसा
हमसे बस थोड़ा ही ऊँचा रावण
जब धूं -धूं जलता रावण
तो नानी बांटती बताशे
सब नाचते
मुझे शायद तब से ही
घृणा थी हिंसा से
जब तक समझा
महाकाव्यों को सिर्फ कथा
तब रावण से नफ़रत
बाकी नहीं बची
हीथक्लीफ़* से प्यार हुआ
रावण तब से है
बाकी सभी महाकाव्यों
के नायक जैसे
वीर, ज्ञानी, प्रसिद्ध
परंतु किसी न किसी
दोष से ग्रसित
क्या राम सदा ही रहे न्यायप्रिय ?
क्या अर्जुन से नहीं हुई कोई भी भूल ?
कुछ एक के महिमागान को
अर्थपूर्ण बनाने के लिए
कुछ को
बना दिया गया
अविश्वसनीय दुष्ट
दस सिर , अनगिनित भुजाएं
नारी का वस्त्रहरण करने वाला
उनका क्या जिन्होंने पत्नी से मांगी अग्नि परीक्षा
चाहते थे जो देखना चरित्र का पहला प्रमाण पत्र
उनका क्या जो दांव पर खेल आये उसे
क्या ये पाप कम थे ?
अब वो सब
बस प्रतीक हैं
कभी पाखंड के, अधर्म के
और अधिकतर अंदर चलने वाले
नियामत द्वंद्व के
* एमिली ब्रोंटे के प्रसिद्ध उपन्यास  Wuthering Heights से