1.2014

जाने वक़्त की कौन सी
पगडण्डी से चल कर आये
ख़ुशी के फ़रिश्ते

और कभी चुपचाप
दस्तक देते
दोस्त ग़म मेरे

और फिर पूछते
” सोचती हो कभी हमें ?”

बाहें फैलाये
मैं कहती – आओ
जो भी लाये हो दे जाओ

ख़ुशी और ग़म के
इस रिश्ते को और बढ़ाओ

क्या मनाने नए साल
तीज-त्यौहार
इका -दुक्का

थामो मेरा हाथ
आओ आज
ज़िन्दगी मनाओ

बहुत किया होगा
तुमने मुँह मीठा
आज मेरी खट्टी-मीठी
यादें चखो

मेरी आत्मा का
खारा – मीठा
ज़बाँ लगाओ

आओ
ज़िन्दगी मनाओ !

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Aapki Pratikriyaein

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