SUFISM

शाम किसी हारे हुए
जुआरी जैसे
सर झुकाये
फटे-घिसे जूते
घसीटते हुए
धुंध में खोती है

न आज का
अफ़सोस
न कल की फ़िक्र

और वहाँ
जहाँ हैं
एक लम्हे को रोज़
ज़मीं -आसमाँ

उससे बहुत दूर
बंद कमरे
में एक्सपर्ट करते हैं
सूफिज्म कि बातें !

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Aapki Pratikriyaein

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