ना मैं होता तो क्या होता

डुबोया मुझको होने ने ना मैं होता तो क्या होता

मेरी पहली दुविधा है मेरी भाषा, इंग्लीश मेरी आवाज़ बन चुकी है और हिन्दी मेरी आत्मा है. Finally मैने हिन्दी को चुना, शायद मुश्किल हो पर आसान तो कुछ भी नहीं होता.ख़ासकर तब जब हम होते हैं in the middle- THE MIDDLE CLASS.
मुझमे अभाव की बेपरवाही नहीं आती और मैं मुक्त भी नहीं हो पाती upper crust जैसे तथाकथित नैतिकता से.

मैं केंद्र हूँ और इसलिए मुझपे केंद्रित हैं हर ओर से सारे दबाव. कहीं पढ़ा था SELF IS A CONSTRUCT अर्थात मैं केवल एक रचना हूँ जो मेरे और दूसरों के अनुभवों, विचारों और प्रतिक्रियाओं से बनती है.सच?

self कुछ होता भी है? मेरे हिसाब से तो अगर होता है तो फ्लूईड होना चाहिए वरना ज़िंदगी मुश्किल रहेगी हमेशा.सही ग़लत भी तो बदलते रहते हैं फिर सेल्फ़ क्यूँ नहीं?
इस मैं की उम्मीदें इसको जीने नहीं देती और इस मैं की ज़िम्मेदारियाँ मरने नहीं देती.भाग नहीं सकते नैतिकता की अदृश्य बेड़ियाँ कहीं जाने ना देगी.

यह शब्दों के कारागार भी अजीब होते हैं, किसी लत जैसे ,इनसे आज़ाद हो कर क्या करेंगे? अच्छा है इनकी दीवारों से सर पटकते रहना.सब शब्द पहले से चुन चुके हैं अपने अर्थ और हर शब्द का भी अपना एक emotional baggage है.

यह leftover language है जिससे काम चलाना होगा.

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Aapki Pratikriyaein

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