नाख़ून

नाखूनों जैसे
हर हफ्ते
यादें बढ़ती हैं

खरोंचती हैं
रूह
की स्याह खाल

भर जाता है
उनमे
विरह का स्वेद
और अपराध-बोध
बहता है
नासूरों से

उसे मालूम है
मेरी ब्लैक कॉफी
में चीनी नहीं होती
मेरे आँसू भी
खारे ही होते हैं
और
मुझे नाख़ून काटना
पसंद नहीं !

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Aapki Pratikriyaein

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