सेकंड चान्सेस

हम ज़िन्दगी से इतनी बार छले जा चुके होते हैं की ऐतबार गैर-मुमकिन सा लगने लगता है। बार-बार दोस्ती में छुपकर , प्यार बनकर इतने दर्द हमें मिले होते हैं कि हर ग़म के साथ हम थोड़ी और ऊंची कर लेते है अपने आस-पास की दीवार।

Survival of the fittest/ सर्वश्रेष्ठ की उत्तरजीविता सिर्फ डार्विन का सिद्धांत नहीं है रोज़मर्रा का सच है ,खुद का सर्वाइवल हमेशा इतना हावी रहता है कि हम अपने अंदर के इंसान को थोड़ा कम कर  देते हैं और जानवर को थोड़ी और जगह दे देते है।

कुछ वक़्त बाद हम आंकने लगते है हर अच्छे जेस्चर को भी स्वार्थ के स्केल पर।  मानो सब कुछ सिर्फ एक “मीन्स टू सम एंड ” हो।

हाँ गलतियाँ बार-बार दोहराना अच्छा नहीं , आज एक दोस्त से सीखा आज़माये हुओं को आज़माना समझदारी नहीं , पर कहीं और भी सीखा था दूसरे मौकों के बारे में – every saint has a past, every sinner a future. The beauty of life is also in its second chances.

इसलिए मेरी एक self-deviced #letgo exercise है – खुद को दोबारा लगाना एक बार हारे हुए दाव पर। पिछली बार के सबक को याद रखना लेकिन फिर भी देना किसी की अच्छी नियत को एक और चान्स।

Holier-than-thou पसंद नहीं मुझे , ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा ,  एक बार और कोई निराश कर देगा ,दुःख देगा ,सबक देगा।

लेकिन सोचो तो अगर इस सेकंड चांस में दोस्ती मिले ,प्यार मिले , तो ये रिस्क बहुत छोटा है और फायदा बहुत बड़ा ,और रिस्क तो रोड पार करने में कहीं ज़्यादा है !

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Aapki Pratikriyaein

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