२१ दिसम्बर

 

२१ दिसम्बर – साल की सबसे लंबी रात मैंने बहुत साल अपनी नानी के छोटे से पहाड़ी गाँव में बितायी। बिजली तब कम -कम आती थी ,पर चूल्हे दिन रात सुलगते , राख में दबा दिए जाते पहाड़ी आलू जो जब कई घंटो बाद भून कर निकलते तो मानो उनकी रूह कुंदन हो जाती। ज़बान पर रखते ही पिघल जाते , सीडू बनते , शिवरात्रि के गीत महीना भर पहले से ही गए जाने लगते।

दूर जुगनुओं जैसे ४० वाट के बल्ब चमकते और नीचे सतलुज एक नागिन जैसी सरकती रहती चुपचाप पहाड़ों की ठंडी पीठ पर। नानी बिलकुल पढ़ी -लिखी नहीं थी पर कहानियां सुनाती किसी एक्सपर्ट स्टोरीटेलर/ किस्सागो जैसे – उनके राक्षस, प्रेत, देवी-देवता मानो जीवंत हो उठते , कभी खेल -खेल में रोटी पर उकेर देती आँखें और मुँह और मैं खुश हो कर राक्षस को खा जाती।

अपनी पहली प्रेम कहानियाँ भी शायद मैंने अपनी नानी से सुनी होंगी।

ये सब जादू लगता है, जादू था भी क्योंकि वहां टीवी नहीं था तब।

फिर टीवी खा गया समय, कहानियाँ ,साथ में रसोई में बैठना , सब अपने-अपने कमरों में क़ैद होने लगे। अब तो क़ैद खाना सिर्फ एक छोटी स्क्रीन भर तक सिमट गया है।

टीवी पर पहली फिल्म आयी थी यह ,जब मैं शायद दसवीं क्लास में थी, ये हमेशा के बन गयी नानी की कहानियों जैसे एक दिसम्बर की काली-लंबी रात की ख़ास याद।

इतने तरसे की प्यास भी न रही …..

TERE DAR PAR SANAM CHALE AAYE….

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Aapki Pratikriyaein

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