बेतरतीब, बेहिसाब , बेवज़ह

हर दरवेश की चौखट पर घिसते हुए पेशानी अपनी, एक ही ख्वाहिश को माला बना घुमाते हुए , रूह एक कभी न पूरा होने वाला जाप हो जैसे। कहते हैं सहारा की रेत को हवाएँ उड़ा ले जाती हैं ऐमज़ॉन के घने हरे जँगलों तक , और उन पोषकों से जी उठते हैं वहाँ के वर्षा-वन। किसी हरयाली में किसी मरुस्थल का होना हम कहाँ समझ पाते हैं। जिनके नाम नहीं वो रिश्ते तब भी मुकम्मिल रहते हैं।

किसी अंग्रेजी विचारक ने कहा है “Chaos has no plural.”

हाँ दिल की उथल पथल ऐसी ही तो है बेतरतीब, बेहिसाब , बेवज़ह

सब लफ्ज़ वक़्त से ख़ैरात में मांगे हुए , मन एक जहाज़ के पंछी जैसा लौट आता है ,क्यूंकि लिखना ही उसका जहाज़ है , नहीं लिखना मौत। आवाज़ के सिक्के हैं, और वादे बिकते हैं इश्क़ की हाट में। मिथकों में जीना न छूटा , छूट गया ज़माना .

“मुझे याद है वो सिलसिला जो था ही नहीं” ….. ये शायरों की बीमारी है , ज़िन्दगी के साथ ही जाती है। वो भी याद रख लेते हैं , जो कभी हुआ ही नहीं।

कब्र पर मोमबतियाँ न जलाना चाहे , याद मत करना मेरी सालगिरह , मौत का दिन,जब तक ज़िंदा हूँ कभी आना चाय पीने …..साथ में सुनेंगे

“कोई ये कैसे बताये कि वो तन्हा क्यों है ”

 

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