ये मोह -मोह के धागे

रूह को शिफ़ा अता होने की सूरत कोई तो होगी , वो जो ज़ख्म दिखाई नहीं देते अब, जिनके निशाँ तो मिटा ले गया वक़्त का जादूगर और दर्द पीछे छोड़ गया , उन ज़ख्मों से आज़ादी क्या हो ? तराशते दिन रात अपनी रूह के कोयले को हीरा बनने की आस में हाथ छलनी हो गए और नज़र आंसुओं से धुंधली , ये नामुराद दिल पर शायरी नहीं भूला।

किसी की आँखों में अपना नाम देखा तो ज़िंदा होने का भरम लौट आया , शाम ढलेगी ही , फौत हर शाम होना ही है उम्मीद को मेरी, तब तक ग्रीन टी की किसी प्याली में , या क़ब्बानी की किसी कविता में सांस भर ज़िन्दगी और सही

मोहभंग हुए भी तो हमेशा किसी नए मोह से
ये मोह -मोह के धागे……..

 

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