आख़िरी मुलाक़ात !

delhi1
ये शहर
गवाह है
मेरी सालगिरहों का
पैदाइश की ,मौत की
और इनके बीच के
लाखों लम्हों की
मोहब्बत और
नाकामी की
यादों से
बुर्की हुई
खुशियों और सबकों की
उम्र बढ़ने की
उगने और कामिल होने की
फैलने -बिखरने के घाव
काटने के निशान वाले बोसे
आगाह होने के
सैंकड़ों अलविदा
मेरे इंतज़ार में हैं
हर कोने में
मेरी रूह
गोल-गोल घूमती है
और खुद को
खुले दिल से
बिखेर देती है
तुम्हारे गोल दायरों
वाले दिल में
अलापते हुए
आख़िरी जनम
आख़िरी मुलाक़ात !
Read this poem in English here : Last Tryst
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