लफ्ज़

चलो एक जगह चुनें
उस पुराना बेंच के पास
या इस देवदार की छाँव में

लफ़्ज़ों को
मायनों की रूह से
आज़ाद कर दें

मुर्दों जैसे भुला दें
ज़िंदा होने के लम्हे
आज इश्क़ की ये रस्म भी
निबाह करें

आओ आज
आवाज़ें दफ़न करें

रूह सूफी है , देने को कुछ बाकी नहीं , लेने  की आरज़ू भी नहीं।  वक़्त पहिया नहीं है , जो बीत गया है , कभी कभी बीतता ही नहीं , वक़्त दरिया है , पहाड़ों की सौगातें दूर दूर तक दिल में जज़्ब किये बहता है। दो लोग अगर दो अलग ज़बानों में करते रहे एक ही बात , तो क्या उसके मायने एक ही होंगे , क्या समझ पाना किसी और के ज़ख्म का दर्द कभी आसान हुआ है , और इसके लिए सिर्फ लफ्ज़ है हमारे पास…. बेबसी और किसे कहते हैं…