अल्फाज़ों के सौदागर

शब्द बाँचते हैं
हम अल्फाज़ों के सौदागर
रोज़ लगाते हैं इस बाज़ार में
अपनी कीमत

और रोज़ शाम
अपनी फटी-पुरानी
आत्मा की चादर
में बाँध लेते हैं बचे-खुचे
अरमान ,अल्फ़ाज़
सम्मान- तिरस्कार
और लिए फिरते हैं
ये बोझ उम्र भर

नफे-नुकसान का
हिसाब लगाते-लगाते
काटते रहते हैं
ज़िंदगी के कलेंडर
से एक-एक दिन करके
सालों- साल