सफ़ेद

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सफ़ेद
घना कोहरा
पहाड़ों को समेटे हुए
अपने मज़बूत बाज़ुओं में

सफ़ेद
बनारस के घाट से दूर
एक तंग गली में
एक कतार में चुपचाप
चलती विधवा गठरियाँ

सफ़ेद
पापा की ठुड्डी पर
एक दिन पुरानी दाढ़ी
रेज़र से हर सुबह
मिटते साल

सफ़ेद
कागज़, स्क्रीन
लफ़्ज़ों की कालिख
के ख्वाब देखते बेवजह

सफ़ेद
मन ,अनछुआ पाक नहीं
भरा हुआ खाली