रुके रुके से क़दम ………..

 

 

रूह के टुकड़े हैं
तस्वीरें, लफ्ज़
आवाज़ें ,नज़रें
पलट के न देखने
के वादे

बहुत मुलायम सही पर
ख़्वाब आयना हैं
ख्वाहिश और
हकीकत के बीच

आरज़ू और ताल्लुक़
के फ़ासले कब मिटे
एक आँसू में भी कभी
डूबती है सारी दुनिया

इश्क़ जो बाँटते फिरते हैं
खैरातों में हर जग़ह
उन्हें रुख्सती के रिवाज़ का
इल्म क्या होगा

“सुबह ना आयी,
कई बार नींद से जागे
थी एक रात की ये जिन्दगी,
गुजार चले……… “