कृष्ण….

 

शुक्र है , कृष्ण मेरे लिए कभी प्रभु न हुए, मित्र रहे , प्रियतम हुए , वो महबूब हुए जिस के लिए दरवेश दरगाहों में बौराये फिरते हैं, वो हज़ारों बटर लैम्प्स कृष्ण हैं जो मक्लिओडगंज के स्तूपों में रौशनी करते हैं। कृष्ण शिमला की क्राइस्ट चर्च में जलती मोमबत्तियाँ हैं , कसौली के पुराने गिरजे की रंग-बिरंगे कांच वाली खिड़की से छनती ,देवदारों को चूमती कृष्ण हैं।

कृष्ण नुसरत साहब की आवाज़ हैं , बाबा बुल्ले की कसूर की खुशबू हैं , वेनिस की नहरें हैं , इस्तानबुल के सूफी कलाम हैं ,कृष्ण गुरूद्वारे के कड़ाह प्रसाद की मिठास हैं।

कृष्ण मेरी आवाज़ हैं और कभी मेरी आँखें , कृष्ण बच्चों की खिलखिलाहट हैं और किसी बुज़ुर्ग की खुरदरी हथेली का आशीर्वाद भी।

कृष्ण हर दिन हैं , हर रात हैं , हरसू हैं

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