इंसान होते होते रह गए

तीन साल सही उम्र नहीं शरणार्थी बन समुद्र में डूब जाने के लिए , छः साल सही उम्र नहीं शारीरिक हिंसा को सही- सही बताने के लिए नए
लफ्ज़ सीखने की।  ओ मेरे खुदाया ये कैसी दुनिया है.…

सभ्य होने से पहले हम जंगली थे पर शायद इतने क्रूर नहीं थे। ग़म खबर नहीं था , अपराध ऐसे नहीं थे की हर सजा नाकाफी लगे

हमने समाज बनाये ,रिश्ते जोड़े ,कानून बनाये ,ख़ुदा ढूंढे और खुद को भूल गए

कमज़ोर को कमज़ोर रखने का स्वार्थ कम न हुआ , अपनी अना के लिए दिल तोडना हमारा पसंदीदा खेल हो गया

इतने झूठ बोले ,इतनी दगा की के सच कुछ होता होगा भूल गए
दुनिया का भला करने निकले और अपने  सितम भूल गए

अच्छे कहानीकार, बेजोड़ फनकार बन गए ,