Nayantara’s Necklace

जब छोटी थी तो घर में था एक बड़ा काला टरर -टरर गोल डायल वाला फ़ोन , उसका चार डिजिट्स वाला नंबर मैं पक्के रट्टू तोते की तरह दोहराती थी।  घंटी बजती तो घर के किसी भी कोने में क्यों न हूँ , भाग कर आती , और अगर कोई दूसरा उठा लेता मुझसे पहले रिसीवर तो बस उसकी खैर नहीं।तब बातें बहुत थी और कहने सुनने वाले भी ……..

अब फ़ोन हथेलियों में समाने वाले ,इतने स्मार्ट हो गया है कि अब फ़ोन इंसानों को रखने लगे हैं ,इंसान फोनों को नहीं। फिर भी जितनी चुप्पियाँ और गलतफहमियां अब हैं उतनी शायद कभी नहीं थी।  वो है न – आवाज़ों के बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने कौन …

अब सब बस कह रहे हैं ,कहना चाहते हैं ,सुनना नहीं।  जिन्हे हम सोचते हैं कि जानते हैं उन्हें कितना जानते हैं ?  मायने लफ़्ज़ों के खो गए हैं या रिश्तों के भी ?

Nayantara’s Necklace ऐसे ही कुछ सवाल पूछती है ,सिर्फ २० मिनट की इस फिल्म को ज़रूर देखिये

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