रज़ामंदी / Consent

 

ज़िंदगी का हरेक पल

दिल की बनावट
सा पेचीदा

हर लम्हा एक सिक्का है
चित भी
पट भी

और हरेक लम्हा
एक चयन
सिक्के की धूरी जितनी दूरी
हमेशा हाँ और न में

हर बार उछालें चलो
ये “इच्छा ” का सिक्का
हर बार क़ुबूल करें
जो भी जवाब हो

न मेरी हाँ में हो
हिचकिचाहट ज़रा भी
न मेरी ना से
तुम्हारी अना को
चोट पहुँचे

तुम भी कहो हाँ या ना
सदियों से तुम पर लदे
मर्दानगी के बोझ बिना

और कभी कभी जो
हाँ और ना पिघलते दिखें
और साफ़ न हो माने इनके
तो भी इश्क़ को अपने
एहसास -ए -जुर्म हम होने न दें

इंतज़ार करें किसी और लम्हे का
जब हाँ और ना साफ़ दिखें
और हम उनको मंज़ूर करें

मोहब्बत में रज़ामंदी से
आशिक़ रहें
कसूरवार न बनें !

 

Advertisements