फ़रेब -ए -नज़र

 

दर्द और मोहब्बत घुलते रहते हैं लगातार , इस जादू में जिसे ज़िन्दगी कहते हैं। बरसात किसी के इश्क़ का पैग़ाम होता होगा , बूँदें कहीं गिरती हैं हज़ारों नोकीली सुइयों जैसी। नज़र का फ़र्क़ कहें या रूहों की तासीरें जुदा , किसी को याद है सब कुछ , किसी को बस अलविदा।

साँसें भी एक तूफानी समन्दर हैं , डूबते हैं रोज़ यहाँ लम्हे कितने और फिर उनकी लाशें तैरती रहती है ज़ेहन की तहों में। ये जिस्म एक कब्रिस्तान है , दफ़नाता है जो हर रोज़ कोई नामुमकिन ख़्वाब , कोई नाजायज़ ख़्वाहिश

दूर होने की तकलीफ दूरी के एहसास से बढ़ जाती है, पास होने के फ़रेब -ए -नज़र काफ़ी नहीं जीने के लिए , खुद के ज़िंदा होने के वहम को बाक़ी रखना ही है इश्क़ मेरा तेरे लिए.

 

….And I know it’ll kill me when it’s over

I don’t wanna think about it

I want you to love me now