तमाशा……

What does it matter how many lovers you have if none of them gives you the universe?

― Jacques Lacan

 

शिकस्त अक्सर अंदर होती है बाक़ी सब नफ़े-नुक़सान दुनिया की महज़ शुमारियत हैं। तुम और मैं ,कभी हम दोनों , कभी एक भी नहीं सब स्टेटिस्टिक हैं। खुद की तरफ मोड़ लेना रूह की स्पॉटलाइट अच्छा भी है बुरा भी , अपने सारी दरारें साफ़-साफ़ दिखने लगती हैं और दुनिया दिखनी बंद। लफ्ज़ बहुत सारे हैं मायने थोड़े , बराबर बंटवारा मुश्किल है।

तस्वीरें ही तस्वीरें , रूहें गुम हैं , आवाज़ें, लफ्ज़, शोर लेकिन मायने समझने को जो बीच की चुप्पियाँ ज़रूरी हैं , वो डूब रही हैं। सब हारने का कैसा डर जिसने खुद ही सौंप दिया हो महबूबे इलाही को उसी का दिया हुआ सब कुछ।

किसी गुरद्वारे में सुबह की कीर्तन की शान्ति , या किसी गिरजे में अकेली टिमटिमाती आखिरी मोमबत्ती की लौ में एक पल को दिखती रूह को चूमना , किसी बच्चे की मुस्कान , किसी बूढ़े चेहरे की लकीरों की ख़ामोशी में समझना ज़िन्दगी के माने।

वरना ये जो एक ज़ेहन का ब्लैकहोल है , ये यूँ तो कभी न भरेगा,
इश्क़, इबादत ,मोहब्बत ,बेवफ़ाई , शायरी ,दर्द सब आते रहे ,जाते रहे ,अश्क़ सब के एक से न थे , तमाशा भी सब का हमने एक सा बना दिया है

ज़िन्दगी, मौत सब मज़ाक , सब तमाशा

मैं डूब रही हूँ , डूबी तो नहीं हूँ……..

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