जिप्सी

जिप्सी होना एक अजीब आज़ादी है जिसकी कीमत है कोई घर नहीं होना , जड़ों से खुद को छुड़ा कर भटकते रहना उम्र भर दर -ब-दर कि कहीं घर मिले ,और जो कहीं मिल जाए तो फिर वही बेकरारी आज़ाद उड़ने की। दुनिया भर के शहरों में छोड़ आना रूह के धड़कते टुकड़े और जिसको इश्क़ की सौगात देना उसको एहसास तक न होने देना की खो रहा है वो तुमको हमेशा के लिए। किसी पसंदीदा जैकेट को कभी फिर किसी ख़ास मौके पर जब पहनेगा चाव से तो एक याद का टुकड़ा ,सीला ,सलवटों भरा निकलेगा किसी जेब से ,और बेख्याली में फ़ेंक दिया जायेगा किसी पुरानी बेकार रसीद जैसे।

जिप्सी होना मुश्किल है ,क्योंकि सब छोड़ना पड़ता है ,मैं भी। कभी कहीं से आया घर की बनी मिठाई का टुकड़ा , या फिर कोई रंग,कोई खुशबू,कोई अलफ़ाज़ लौटा लाता है उस एहसास को जिसे घर कहते हैं ,वो जो कुछ ज़िन्दगी से लंबे ,सांस से कीमती लम्हे होते हैं ,किसी के होने के ,कोई घर होने के। नाम ,पते ,पहचान सब मांगे हुए हैं ,और जो अपना है वही और किसी का क्यों है ….

koi yeh kaise bataye…