सुशीला

उसकी बायीं कलाई पर पहले ही दिन मैंने एक छोटी सी गुडिया का फीका नीले रंग का गोदना देखा था. अजीब था क्यूंकि अक्सर गाँव की प्रथानुसार इन में से अधिकतर औरतों के हाथ में कोई फूल पत्ते या फिर पति के नाम के अक्षर गुदे होते .
मेरी गुडिया की आया दस दिन की छुट्टी पर गयी तो इसको रख गयी .बालों और चहरे से साफ़ पता चलता 40 से तो ऊपर ही होगी। पहले ही दिन जाने से पहले , शाम के नाश्ते से दो मट्ठियाँ उसने एक अखबार में लपेट ली ,खुद ही बोली ,”दीदी मेरी लड़की है 6  साल की, उसको दूंगी। ”
मैंने ज्यादा नहीं पूछा बस दो मट्ठी और रख दी .अगले दिन मैंने पूछा “तुम्हारी मुन्नी स्कूल जाती है?”, तो वो मानो  चौंक गयी बोली ,” हाँ,हाँ दीदी जाती है। ”
उसकी हडबडाहट से से मुझे गुस्सा आया, सोचा  देखो झूठ  बोलते शर्म  भी नहीं आती इनको , ज़रूर बच्ची को कहीं  काम  पर भेजती होगी।
वो कम बोलती और मैं अक्सर सोचती  मुझे  तो सबसे यही सुनने को मिला था की सुशीला तो पूरी बस्ती में सब से अच्छा गाती थी , खूब मुंह फट थी , वो सच था फिर यह।
दस दिन बाद वो चली गयी। दीवाली  पर जब सब को कुछ  देने  लगी  तो सोचा सुशीला की बच्ची के लिए भी  कुछ भेज दूं। आरती को लिफाफा दिया तो उसने मुंह पर हाथ रख लिया, कुछ देर बाद बोली , “दीदी आप भी उसकी बातों में आ गयी ,उसका कोई बच्चा नहीं  ,पहली बार जब उम्मीद से थी तो वो गुडिया का गोदना करवाया था उसने पर  वो गुड़िया गोदना ही  रही ,कभी उसकी  गोद नहीं भरी।
वो सुशीला तो पागल है। कोई कुछ कह न दे  इस  डर से सबको झूठ बोलती है।
मैं सुन्न खड़ी थी। एक बज रहा था , मेरी गुड़िया स्कूल से आने वाली थी।