दिल एक बर्फ का टुकड़ा है

सर्दियाँ और कोहरा मुझे पसंद नहीं। मौत का एहसास ज़िंदा होते हुए।

दिल एक बर्फ का टुकड़ा है ,आइस क्यूब जैसे खूबूसरत नहीं, बराबर नहीं , तेज़ नोकीले किनारों वाला ,जिसको छुआ घाव किया। ज़िन्दगी की व्हिस्की ऑन द रॉक्स पर पिघलने वाला नहीं ,एक लम्हे का जमा हुआ पत्थर ,भरा हुआ खाली।

कोहरे को चीरती हुई एक सदियों पुरानी रूह ढूंढती हुई अपना घर पहुँचती है जब तुम तक , तो छुपा लेती है सर्द वक़्त के ज़ख्म ,हज़ारों शिकवे , सीने के बीचों -बीच का एक ब्लैक होल जिसमें दफ़न हैं सारे बर्फ जज़्बात।

दो किनारे हैं , दोनों से इश्क़ है मुझे ,दोनों को छू कर लौटना होता है वापस ,मैं एक बहाव हूँ मुझे रुकना नहीं नसीब और फिर भी जब सर्द मौसमों में मेरा चेहरा जम जाता है ,रूह की तहें अंदर ही अंदर लौटती हैं किनारों तक उसी पुरानी घर की तलाश में। पहाड़ों से जब जुदा होता है दरिया , तो वो हमेशा की जुदाई होती है , वो जो फिर खारा हो,दोबारा भाप बन,बादल बन बरसता है वो कोई और ही दरिया होता है।

लेकिन फिर जब बर्फ होता है पहाड़ का दिल तो वो याद करता है वही रूह का पहला रिश्ता। तू मेरा नहीं था कभी भी ,न होगा , मैं तेरी हूँ अब इसे जो भी समझ…… पता नहीं कौन सी ग़ज़ल अटकी है , पहाड़ों की ढलानदार छत्तों से जैसे सुबह लटकते रहते थे बर्फ के चमकते जमे हुए हीरे ……. जबाँ पे रखो तो पूरा मौसम ,छन्न से टूटते और ख्वाब जैसे बिखर जाते।

वो जिसका इश्क़ तपिश था ,ज़िन्दगी था उसने छुआ होगा जब, तो क्या पिघल होगा बर्फ दिल ? फिर से मौत ,फिर से बर्फ होना यही है मुक़द्दर इसका …….

काश यही हो रूह का आख़िरी सर्द मौसम

आख़िरी ख़्वाहिश पूछेगा तो – रंजिश ही सही ,दिल ही दुखाने के लिए आ