एक दर्द है ज़रा ज़रा 

सब सब्र था 
सब बेबसी 
तुझसे पहले 
तेरे बाद भी 
एक नरम सा 
मेरा ख्वाब था 
तेरी रूह में 
दबा कहीं 
अब एक दर्द है 
कुछ खारा सा 
कुछ खुरदरा 
एक दर्द है ज़रा ज़रा 

 

 

क्या इत्तेफ़ाक़ बस इत्तेफ़ाक़ होते हैं ? इत्तेफ़ाकन होते रहते हैं उम्र भर , मिलना -बिछड़ना , टूटना-बिखरना , जुड़ना फिर टूटना , कहानियों का बनना, बन कर बिगड़ना ,अधूरा रहना , मुक़म्मल होना , या मुक़म्मल हो कर भी अधूरा होना। जैसे कायनात की हज़ार साज़िशें हमारे ख़िलाफ़ , और कहीं कोई चुपचाप देखता हो ये तमाशा , ये तड़प, ये शिद्दत , ये रंजो-ग़म , और बस सवाल , मैं क्यों , मैं ही क्यों
मुझे तुझसे कुछ नहीं चाहिये , मुझे मांगने की अदा न दे. ……