किशोर की आवाज़ और ज़िंदगी की शर्तें

किसी-किसी दिन
सिर्फ़ किशोर की आवाज़
गूँजती रहती है
बार-बार
” वो फिर नही आते….”

और एक बेचैन
अबाबील की
पीली आँख जैसे
हम भटकते रहते हैं
किसी और के
अकेलेपन में

हज़ारों मील दूर
किसी मशहूर अजनबी
की मौत का सन्नाटा
और भारी
कर जाता है
एक उमस भरी
तन्हा शाम
की पलकें

मुझे लौटना पड़ता है
बूकोवस्की की
सोहबत में
क्यूंकी और कोई
हमदम नहीं बाकी

इस महबूब दुनिया से
क्या गिला करें
जिसने साफ-साफ
रख दी हैं
ज़िंदगी की शर्तें