भाषा

 

 

मेरी भाषा का कोई एक नाम, एक मज़हब नहीं है  , अरे इंसान के भी दो होते हैं माँ-बाप !

मेरी भाषा पोस्ट-मॉडर्न है , उसके अंदाज़ किसी एक देश , एक संस्कृति के नहीं है , मैं बोलने , पढ़ने, सुनने , समझने को बाँध कर नहीं रखना चाहती। मेरी जड़ें मज़बूत हैं इसलिए जब नयी शाखाएं फूटती हैं तो मैं डर से नहीं कांपती , उस नयी कोंपल की परवरिश करती हूँ , उसके साथ जीने के नए हुनर सीखती हूँ। भाषा को नदी होना चाहिए , उसी कोशिश में हूँ , जड़ और चेतन वाला मेरा सिद्धांत तो न जाने कितनी भाषाओँ ने अपना लिया है।

“What cannot be said above all must not be silenced but written.”
― Jacques Derrida

लिखने की लिपियाँ अलग हो सकती हैं , सन्दर्भ अलग हो सकते हैं पर मानचित्रों पर खींची रेखाएं दिल नहीं बांटती , सुना है कोई नुसरत मीरा के भजन भी गाता है, और गुरद्वारों में सूफ़ियत ज़िंदा है अब भी , १९४७ सिर्फ एक तारिख है, भाषा न मरी , न हिटलर का नाज़ी कैम्पों में , सौल बिलो के उपन्यास सिर्फ यहूदी नहीं , एलियट की कवितायेँ सिर्फ अंग्रेजी या फिर प्रेमचंद की कहानियां सिर्फ हिंदी.

मैं एक जीवंत भाषा हूँ , रोज़ नयी सांस लेती हूँ , अपने पैमानों को ज़ंजीर बनाकर मेरी बेड़ियाँ न कसो , मेरा दम मत घोटो

मुझे जीने दो

“Language is a skin: I rub my language against the other. It is as if I had words instead of fingers, or fingers at the tip of my words. My language trembles with desire.”
― Roland Barthes

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