दोबारा पूछो

 

 

डिप्रेशन /अवसाद किसी को भी घेर सकता है , जो तन्हा हैं , किसी तक़लीफ़ में हैं उन्हें तो अक्सर घेरता ही है लेकिन कभी -कभी सब कुछ अच्छा होते हुए भी  ये एक न दिखने वाले प्रेत जैसे मन में घर कर जाता है।

अवसाद छुपाना भी आम है क्योंकि हमारा समाज मानसिक तकलीफों के लिए एक सामूहिक शब्द इस्तेमाल करता है – पागल, जो अक्सर गाली या तिरस्कार जैसे बोला जाता है , जैसे मानसिक बीमारी कोई जान बूझ कर की हुई गलती हो , या कोई पाप। इसलिए लोग सालों साल मर- मर कर जीते हैं , और बोलते रहते हैं ‘मैं ठीक हूँ “.

फिर किसी दिन जब कोई आत्महत्या होती है या कोई अवसादग्रसित कोई अपराध करता है , कूदते है डिबेट में , ये करना चाहिए था….. ऐसा नहीं हुआ, वैसा होता तो। …..

किसी हादसे का इंतज़ार मत करो
किसीके टुकड़े टुकड़े बिखरने तक
चुपचाप तमाशा मत देखो

पूछो, सुनो ,महसूस करो
हाथ बढाओ ,
दोबारा पूछो