कसमें ,वादे ,प्यार ,वफ़ा ………

दर्द क्या ज़्यादा है- इंतज़ार या मजबूरी। Poet होने की मजबूरी है मेटफर्स में बातें करना और इंतज़ार रहना उस एक लफ्ज़ का जो ज़हन में जोंक की तरह चिपक जाए।  मेरे पहाड़ी शहर में जब जोंके पैरों से चिपकती और खून चूसने लगती ,उनपर नमक छिड़का जाता उनका डंक खोलने के लिए ,और नमक छिड़का जाता रास्तों की बर्फ पर उसे पिघलाने के लिए।

यादों की जोंकें ,ज़ेहन में चिपके लफ्ज़ ,वक़्त के नमक से भी नहीं छूटते । कल से किसी का एक लफ्ज़ गले में अटका हुआ है ,सांस रोकता हुआ , आवाज़ घोंटता हुआ।

दुनिया वादों पर कायम है , चाहे वादे उम्मीदों की क़ैद क्यों न बन जाये। कसमें ,वादे ,प्यार ,वफ़ा सब बातें हैं ,बातों का क्या
एक गेम है जिसके सब चैंपियन हैं – I love you.